My Life: My Cup: My Tea
Monday, May 10, 2010
टीस
साफ़ धरा पे उग आती हैं
ज्यों मटमैली खरपतवारें
जहाँ नहीं कुछ हो सकता है
बन जाती हैं वहां दीवारें
लिपे चूल्हे की सौंधी महक को
भूल जलाती ज्यों अंगारे
शाम सवेरे, निपट अंधेरे
दीप बुझाती ज्यो उजियारे
तेज़ हवा के 'उस झोंके सी'
टीस उठे यों मन के द्वारे।।।
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