Monday, March 24, 2025

सपना

मेरा सपना था के मैं एक महान इंसान बनूँ, जैसा की कोई भी सोच सकता है, क्योंकि सोचने का कुछ नहीं खर्च होता और वैसे भी आदमी पूरी ज़िन्दगी का काफी वक़्त सोचने में ही तो बिताता है। धीरे धीरे वक़्त बीता और असलियत का मुजाहिरा हुआ। धुप देखि, बचपन में छिले घुटनों पर मरहम लगाया, स्कूल में मास्टर जी के हाथों अच्छा बच्चा होने के एवज में बड़ा पिटा। डरपोक होने की हद तक शर्मीला और आज्ञाकारी जीवन बिताया। बड़ी मुश्किल से थोडा सा बड़ा हुआ और एक खुले से स्कूल में पहुंचे। पहली बार इतने अच्छे मास्टर मिले जो मेरे अलावा और बच्चो पे भी अत्यचार करने में यकीं करते थे और ठुकाई करने में समानता का व्यहवहार करते थे। दिन बीतने लगे। बरसातें आई और चली गयी और साइकिल की सिखाई में तीन वर्ष और बीतें।

 दंगा हुआ,

क़त्ल हो गयी इंसानियत
बिखर गयी उम्मीदें
जो हर दिन बनती थी
थोडा थोडा
जब शाम को भाई, पिता या अब्बा,
खेत से, रिक्शे या ठेले को धकेल के
रुपये दो रुपये की
दाल रोटी, थोडा
चटनी का सामान,
एक आध कापी किताब
ले कर आया करता था
दिन भर तोड़ता था
हाड़ कि  जुटा सकें
कुछ मेहर या दहेज़
बेटी या बहन
के  वास्ते,
अब ज़रूरत नहीं है!
क्यों ?
क्योंकि जलते घरों
में बारातें न जाती है
न आती है!
न जाते हैं बच्चे
स्कूल ,
न पलती हैं उम्मीदें
अपने लाचार
माँ बाप को कभी सुकून
दे पाने की !
क्योंकि दंगा हुआ
मर गयी इंसानियत!

डॉ. वरुण -
मुज़फ्फरनगर से

This poem was composed in 2013 after the Muzaffarnagar riots. However, publishing it after long years in 2025... due to reasons best known to providence. 

उत्तरकाशी: एक पर्वतीय द्वीप, एक टीस


बीती १ ५-१६ जून को अतिवृष्टि से आई दैवीय आपदा ने उत्तराखंड में हजारों जिंदगियां छीन ली थी और इस विभीषिका ने कितनी ही जिंदगियां बदल भी दी थी. ऐसी ही एक ज़िन्दगी मेरी भी थी! घर में बैठ कर टीवी पर देखना जब असह्य हो गया तो निर्णय लिया की जाना है उत्तराखंड, जल्द से जल्द! जिस से भी साथ चलने को कहा, सराहना तो मिली और आश्वासन भी मगर साथ न मिला। सो चार मित्रों का एक दल अपने अपने काम धंधे छोड़ कर  तैय्यारी में लग गय।
यह एक मुश्किल निर्णय था, एक और अपने काम की ज़िम्मेदारिया दुसरे परिवार में स्वयं ही अकस्मात् उत्पन्न हो गयी घोर असुरक्षा और चिंता।  माता -पिता,  पत्नी सबकी ना थी, क्योंकि उत्तराखण्ड उस वक़्त हालात बहुत विकट थे और  जो जानकारियाँ छन कर बाहर आ पा रही थी वह भयावह थी। बहुत मुश्किल हुई मगर परिवार ने देशसेवा के नाम पर आखिरकार जाने की अनुमति दे ही दी.


Wednesday, January 26, 2011


आदमी और पत्ता...

दोनों अलग मगर एक,

दोनों उगते, पलते और ढलते

कोशिश करते कि अपने नियति को

बदल डालें...

समाज और पेड़ को

कुछ दे डालें.

सार्थक कर सकें अपने होने को

करोड़ों अरबों में

बन सकें कुछ अलग..

मगर,

ढलता हैं और टूट जाता है

हर आदमी और पत्ता!



प्यार और अँधेरा,
दोनों एक,


मगर फर्क इतना कि
दोनों बहते हैं जीवनधारा के
दो किनारे बनकर
जिनको मिलना ही है

किसी न किसी मोड़ पर !

जो शुरू हो जाते हैं
दिलों के जुड़ते ही.
और ऊंचे होते हैं
अरमानो के मचलने से
एहसासों के सिसकने तक
तन्हाई सी दुपहरियो से
एहसानों के घुमड़ने तक,
बस घुलती है स्याही और

बहती जाती है

आँखों से...
जब मिलते हैं
प्यार और अँधेरा...


सांझ हुई तो झाँक रहा है

झुरमुट के जालो से कोई
भूख लगी है मांग रहा है

गेहूं के बालो से कोई...!

आसमान में झाड़ू कर दो

आसमान में झाडू कर दो
सूरज को भी परे पटक दो,
चाँद पीट के चपटा कर दो
ख़ाली हो जब, कुछ दाने बो दो
धरती भर गयी, चलो आकाश जोत दो...!