My Life: My Cup: My Tea
Monday, May 10, 2010
टीस
साफ़ धरा पे उग आती हैं
ज्यों मटमैली खरपतवारें
जहाँ नहीं कुछ हो सकता है
बन जाती हैं वहां दीवारें
लिपे चूल्हे की सौंधी महक को
भूल जलाती ज्यों अंगारे
शाम सवेरे, निपट अंधेरे
दीप बुझाती ज्यो उजियारे
तेज़ हवा के 'उस झोंके सी'
टीस उठे यों मन के द्वारे।।।
2 comments:
Anil Chauhan "Veer"
November 2, 2017 at 8:34 PM
अप्रतीम कविता
Reply
Delete
Replies
Reply
पवन धीमान
September 3, 2018 at 10:49 PM
वाह क्या बात है।
Reply
Delete
Replies
Reply
Add comment
Load more...
Newer Post
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
अप्रतीम कविता
ReplyDeleteवाह क्या बात है।
ReplyDelete