Wednesday, January 26, 2011


आदमी और पत्ता...

दोनों अलग मगर एक,

दोनों उगते, पलते और ढलते

कोशिश करते कि अपने नियति को

बदल डालें...

समाज और पेड़ को

कुछ दे डालें.

सार्थक कर सकें अपने होने को

करोड़ों अरबों में

बन सकें कुछ अलग..

मगर,

ढलता हैं और टूट जाता है

हर आदमी और पत्ता!



प्यार और अँधेरा,
दोनों एक,


मगर फर्क इतना कि
दोनों बहते हैं जीवनधारा के
दो किनारे बनकर
जिनको मिलना ही है

किसी न किसी मोड़ पर !

जो शुरू हो जाते हैं
दिलों के जुड़ते ही.
और ऊंचे होते हैं
अरमानो के मचलने से
एहसासों के सिसकने तक
तन्हाई सी दुपहरियो से
एहसानों के घुमड़ने तक,
बस घुलती है स्याही और

बहती जाती है

आँखों से...
जब मिलते हैं
प्यार और अँधेरा...


सांझ हुई तो झाँक रहा है

झुरमुट के जालो से कोई
भूख लगी है मांग रहा है

गेहूं के बालो से कोई...!

आसमान में झाड़ू कर दो

आसमान में झाडू कर दो
सूरज को भी परे पटक दो,
चाँद पीट के चपटा कर दो
ख़ाली हो जब, कुछ दाने बो दो
धरती भर गयी, चलो आकाश जोत दो...!