
आदमी और पत्ता...
दोनों अलग मगर एक,
दोनों उगते, पलते और ढलते
कोशिश करते कि अपने नियति को
बदल डालें...
समाज और पेड़ को
कुछ दे डालें.
सार्थक कर सकें अपने होने को
करोड़ों अरबों में
बन सकें कुछ अलग..
मगर,
ढलता हैं और टूट जाता है
हर आदमी और पत्ता!
दोनों अलग मगर एक,
दोनों उगते, पलते और ढलते
कोशिश करते कि अपने नियति को
बदल डालें...
समाज और पेड़ को
कुछ दे डालें.
सार्थक कर सकें अपने होने को
करोड़ों अरबों में
बन सकें कुछ अलग..
मगर,
ढलता हैं और टूट जाता है
हर आदमी और पत्ता!
आह! वाह।
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