मेरा सपना था के मैं एक महान इंसान बनूँ, जैसा की कोई भी सोच सकता है, क्योंकि सोचने का कुछ नहीं खर्च होता और वैसे भी आदमी पूरी ज़िन्दगी का काफी वक़्त सोचने में ही तो बिताता है। धीरे धीरे वक़्त बीता और असलियत का मुजाहिरा हुआ। धुप देखि, बचपन में छिले घुटनों पर मरहम लगाया, स्कूल में मास्टर जी के हाथों अच्छा बच्चा होने के एवज में बड़ा पिटा। डरपोक होने की हद तक शर्मीला और आज्ञाकारी जीवन बिताया। बड़ी मुश्किल से थोडा सा बड़ा हुआ और एक खुले से स्कूल में पहुंचे। पहली बार इतने अच्छे मास्टर मिले जो मेरे अलावा और बच्चो पे भी अत्यचार करने में यकीं करते थे और ठुकाई करने में समानता का व्यहवहार करते थे। दिन बीतने लगे। बरसातें आई और चली गयी और साइकिल की सिखाई में तीन वर्ष और बीतें।
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