Monday, March 24, 2025

 दंगा हुआ,

क़त्ल हो गयी इंसानियत
बिखर गयी उम्मीदें
जो हर दिन बनती थी
थोडा थोडा
जब शाम को भाई, पिता या अब्बा,
खेत से, रिक्शे या ठेले को धकेल के
रुपये दो रुपये की
दाल रोटी, थोडा
चटनी का सामान,
एक आध कापी किताब
ले कर आया करता था
दिन भर तोड़ता था
हाड़ कि  जुटा सकें
कुछ मेहर या दहेज़
बेटी या बहन
के  वास्ते,
अब ज़रूरत नहीं है!
क्यों ?
क्योंकि जलते घरों
में बारातें न जाती है
न आती है!
न जाते हैं बच्चे
स्कूल ,
न पलती हैं उम्मीदें
अपने लाचार
माँ बाप को कभी सुकून
दे पाने की !
क्योंकि दंगा हुआ
मर गयी इंसानियत!

डॉ. वरुण -
मुज़फ्फरनगर से

This poem was composed in 2013 after the Muzaffarnagar riots. However, publishing it after long years in 2025... due to reasons best known to providence. 

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